कुछ भी तो नही होता और दिन हो जता है कल.....


कुछ भी तो नही होता,
और दिन हो जता है कल...

सुबह होती है यूं ही अलसाई सी,
और तभी आ जाती है शाम भी,
दिन गिनता हूँ तो तीस हो जाते हैं,
और गिनता हूँ महीने तो बारह,
साल गिनता हूँ तो लगता है,
कि कम है एक उम्र भी,
यूँही कटता है जीवन का हर पल,
कुछ भी तो नही होता और दिन हो जता है कल...

रात आती है तो आती है नींद भी,
साथ लाती है स्वप्न भी,
जगता हूँ तो पता हूँ,
अरे मैं तो वहीं हूँ,
रोज़ वही सब कुछ,
स्कूल बसों का हार्न,
ऑफिस जाने वालों का क्रन्दन,
फिर भी ना जाने क्यों लगता है,
क्या रूक जाएगा जीवन का स्पंदन,
इतने लोग हर ओर,
साबका अपना अपना शोर,
सुने कैसे कोई मेरा कोलाहल,
कुछ भी तो नही होता,
और दिन हो जता है कल...

मैं जीवन को जीता हूँ,
या जीवन जीता है मुझको,
किससे पूछूं,
अपने जैसे ही पता हूँ मैं सबको,
सोचा करता हूँ,
बस कल....कल से होगा परिवर्तन,
पर हर रोज़ सुबह,
घिर आतें हैं आशंकाओं के बदल,
कुछ भी तो नहीं होता,
और दिन हो जता है कल...

प्रतिदिन करता हूँ अपने से,
सपनो को सच करने के वादे,
ऐसे ही बीत गए हैं,
मेरे जीवन के दिन आधे,
ना जाने क्यों करता हूँ मैं,
अपने से यह छल,
कुछ भी तो नहीं होता,
और दिन हो जता है कल....

सोचा कितनी बार,
अब और नहीं रहने दूंगा,
मैं ऐसा संसार,
पर ना जाने क्यों,
सोते में अपनी करवट भी,
ना सका बदल,
कुछ भी तो नही होता,
और दिन हो जता है कल.....

मैं रुका भी नहीं,
कहीँ पंहुचा भी नहीं,
ना जाने कैसे रहा था मैं चल,
कुछ भी तो नहीं होता,
और दिन हो जता है कल.......


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